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ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य - ४: स्थायी दशा सिद्धान्त

ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य - ४: स्थायी दशा सिद्धान्त
तीसरे दशक के बाद अनेक वैज्ञानिक, जिनके मन को यह प्रसारी ब्रह्माण्ड नहीं भा रहा था, यह प्रश्न कर रहे थे कि यदि ब्रह्माण्ड का प्रारंभ हुआ था, तब उस क्षण के पहले क्या स्थिति थी
अत्यन्त विशाल ब्रह्माण्ड एक अत्यन्त सूक्ष्म बिन्दु में कैसे संकेन्दि`त हो सकता है? उस बिन्दु में समाहित पदार्थ का विस्फोट क्यों हुआ? उतना अकल्पनीय पदार्थ कहां से आ गया? और प्रसार या विस्तार के बाद ब्रह्माण्ड का अन्त क्या होगा? इनमें से अधिकांश प्रश्न तो मुख्यतया विज्ञान के प्रश्न नहीं वरन दर्शन विषय के प्रश्न हैं, अथार्त यह दशार्ता है कि वैज्ञानिक भी कभी कभी प्रत्यक्ष की तुलना में दार्शनिक अवधारणाओं को अधिक महत्व देते हैं। अस्तु! तीन वैज्ञानिकों गोल्ड, बान्डी तथा हॉयल ने 1948 में एक संवधिर्त सिद्धान्त प्रस्तुत किया – ‘स्थायी दशा सिद्धान्त’। अथार्त यह ब्रह्माण्ड प्रत्येक काल में तथा हर दिशा में एक सा ही रहता है, उसमें परिवर्तन नहीं होता। इस तरह उपरोक्त प्रश्नों को निरस्त्र कर दिया गया। क्योंकि इस सिद्धान्त के तहत ब्रह्माण्ड अनादि तथा अनन्त माना गया है। इसलिये इसमें न तो प्रारम्भ का प्रश्न है और न अन्त का। किन्तु प्रसारण के कारण उत्पन्न विषमता को कैसे बराबर किया जा सकता है?
ऐसे स्थायी ब्रह्माण्ड में मन्दाकिनियों के प्रसारण के कारण पदार्थ के वितरण में अन्तर अवश्य आएगा, क्योंकि प्रसार के केन्द्र में शून्य बनेगा। इस आरोप से बचने के लिये उन्होंने घोषणा की कि ऐसे केन्द्र पर ऊर्जा स्वयं पदार्थ में बदल जाएगी और वह पदार्थों के लिये एक फव्वारे की तरह स्रोत बन जाएगा जो पदार्थ वितरण की एकरूपता को बनाकर रखेगा। यह अवधारणा भी अनेकों प्रश्न पैदा करती है। उस स्थान पर अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा कैसे आएगी, और अनन्तकाल तक कैसे आती रहेगी। ऐसे प्रश्नों को उन्होंने व्यर्थ तथा निरर्थक प्रश्न कहकर टाल दिया। और लगभग दस वर्ष तक यह सिद्धान्त वैज्ञानिकों में मान्य रहा क्योंकि इस सिद्धान्त ने ब्रह्माण्ड में हाइड्रोजन तथा हीलियम के बाहुल्य को, सुपरनोवा की कार्यप्रणाली के द्वारा समझाया था जिसे मूल प्रसारी सिद्धान्त नहीं समझा पाया था।
इसे जार्ज गैमो ने बाद में क्वाण्टम सिद्धान्त के आधार पर ‘प्रसारी सिद्धान्त’ के तहत सिद्ध किया : प्रथम तीन मिनिटों में ड्यूटीरियम, तथा हीलियम एवं लिथियम के आइसोटोप घोषित अनुपात में बन गये थे। ‘स्थायी दशा सिद्धान्त’ को 1941 में घोषित किये गये व्हीलर तथा फाइनमान के एक अनोखे सिद्धान्त से भी बल मिला। इस सिद्धान्त में गणितीय सूत्रों के आधार पर यह माना गया कि समय पीछे की ओर भी चल सकता है, अथार्त भविष्य से भूतकाल की ओर चल सकता है। यह ब्रह्माण्ड के समय में समांग होने की पुष्टि करता है। किन्तु अवलोकनों से प्राप्त तथ्यों के द्वारा स्थायी दशा सिद्धान्त के लिये कठिनाइयां उत्पन्न होती गईं। उनमें से एक है ‘रेडियो स्रोतों’ का अधिक दूरियों, अथार्त प्रारंभिक अवस्था में आज की अपेक्षा आधिक्य, अथार्त ब्रह्माण्ड की में दशा में समय या दूरी के आधार पर अन्तर का होना। 1966 में क्वेसारों की खोज हुई। क्वेसार परिमाण में छोटे किन्तु दीप्ति में बहुत तेज पिण्ड होते हैं, और ये केवल अधिक दूरी पर ही मिलते हैं। अथार्त कुछ सैकड़ों करोड़ों वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड की दशा बहुत भिन्न थी। और भी कि पृष्ठभूमि सूक्ष्मतरंग विकिरण का तापक्रम प्रारम्भ से ही बदलता आया है।
पृष्ठभूमि सूक्ष्मतरंग विकिरण
1965 में ब्रह्माण्ड में ‘पृष्ठभूमि सूक्ष्मतरंग विकिरण’ (पृ सू वि) (बैकग्राउण्ड माइक्रोवेव रेडियेशन) की खोज हुई। पृ सू वि की खोज करने वाले दो वैज्ञानिकों पैन्जियास तथा विल्सन को 1978 में नोबेल पुरस्कार मिला। प्रसारी सिद्धान्त के अनुसार प्रारंभ में जब पदार्थ के सूक्ष्मतम तथा घनतम अण्ड का विस्फोट हुआ था, उस समय जो विकिरण हुए थे, सारे ब्रह्माण्ड में उनके अवशेष होना चाहिये। उन्हीं अवशेषों की एक पृष्ठभूमि की तरह उपस्थिति की खोज हुई। चूंकि यह सूक्ष्मतरंग विकिरण सभी दिशाओं में समान रूप से उपस्थित मिलता है, इसका नाम ‘पृष्ठभूमि सूक्ष्म तरंग विकिरण’ रखा गया। यह प्रसारी सिद्धान्त का एक अकाट्य प्रमाण स्थापित हुआ और अधिकांश विद्वानों ने स्थायी दशा सिद्धान्त के बरअक्स ब्रह्माण्ड के विकास का प्रसारी सिद्धान्त स्वीकार किया।
प्रसार का एक और प्रमाण महत्वपूर्ण है। पुणे स्थित खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी के अन्तर–विश्वविद्यालय केन्द्र के डा.रघुनाथन श्रीआनन्द ने अपने साथियों के साथ एक क्वेसार से निकले प्रकाश का अथ्ययन किया। उस समय ब्रह्माण्ड की आयु आज की आयु का पंचमांश थी। उस प्रकाश ने काबर्न के एक अणु को उद्दीपत किया। इस उद्दीप्त काबर्न के अणु से विकिरित प्रकाश को उन्होंने पकड़ा जिससे उन्हें ज्ञात हुआ कि उस काबर्न का तापक्रम परमशून्य से 6 से 14 अंश कैल्वियन अधिक था। आज तो ब्रह्माण्ड का वैसा ही तापक्रम 3 कैल्वियन से भी कम है। यह न केवल दशार्ता है कि महान विस्फोट के पश्चात ब्रह्माण्ड का तापक्रम कम होता जा रहा है, वरन यह भी कि यह अन्तर प्रसारी सिद्धान्त के अनुकूल सही मात्रा में भी है।
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